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सत्यनारायण व्रत कथा हिंदी में और व्रत का महत्व
सत्यनारायण व्रत भगवान विष्णु के सत्यस्वरूप को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत माना जाता है। यह व्रत श्रद्धा और नियम के साथ करने से जीवन के दुख, दरिद्रता और बाधाएं दूर होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि सत्यनारायण व्रत कथा आरती सहित करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। यह व्रत विशेष रूप से पूर्णिमा के दिन किया जाता है, लेकिन किसी भी शुभ दिन इसे किया जा सकता है।
सत्यनारायण व्रत कथा हिंदी में प्रथम अध्याय
एक समय की बात है, नैमिषारण्य में अनेक ऋषि-मुनि एकत्र होकर सूतजी से प्रश्न करते हैं। वे कहते हैं कि कलियुग में मनुष्य अनेक कष्टों से घिरा हुआ है, ऐसे में कौन-सा व्रत करने से सभी दुखों का नाश होता है। तब सूतजी बताते हैं कि नारद मुनि ने भी यही प्रश्न भगवान विष्णु से किया था। भगवान विष्णु ने नारद जी को सत्यनारायण व्रत का विधान बताया और कहा कि यह व्रत सच्चे मन से करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है।
सत्यनारायण व्रत कथा हिंदी में द्वितीय अध्याय
काशी नगरी में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण रहता था। वह बहुत दुखी और परेशान रहता था। एक दिन भगवान सत्यनारायण वृद्ध ब्राह्मण के रूप में उसके पास आए और व्रत करने की सलाह दी। ब्राह्मण ने विधि-विधान से सत्यनारायण व्रत किया। कुछ समय बाद उसकी दरिद्रता दूर हो गई और उसके घर में सुख-समृद्धि आ गई। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची श्रद्धा से किया गया व्रत कभी निष्फल नहीं जाता।
सत्यनारायण व्रत कथा हिंदी में तृतीय अध्याय
उसी नगर में एक लकड़हारा रहता था। उसने ब्राह्मण को सुखी होते देखा और उससे कारण पूछा। जब उसे सत्यनारायण व्रत के बारे में पता चला, तो उसने भी व्रत करने का निश्चय किया। लकड़हारे ने नियमपूर्वक व्रत किया और कुछ ही समय में वह धनवान हो गया। लेकिन एक बार उसने अहंकारवश व्रत को अधूरा छोड़ दिया, जिससे उसे फिर कष्ट झेलने पड़े। बाद में पश्चाताप कर व्रत पूरा किया, तब भगवान ने पुनः कृपा की।
सत्यनारायण व्रत कथा हिंदी में चतुर्थ अध्याय
इसके बाद राजा उल्कामुख की कथा आती है। राजा ने पहले सत्यनारायण व्रत का अपमान किया, जिसके कारण उसका राज्य संकट में पड़ गया। जब राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ, तब उसने पूरे विधि-विधान से सत्यनारायण व्रत किया। भगवान की कृपा से उसका राज्य और सम्मान वापस मिल गया।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि व्रत में श्रद्धा और नियम बहुत आवश्यक हैं।
सत्यनारायण व्रत कथा हिंदी में पंचम अध्याय
अंतिम अध्याय में व्यापारी साधु की कथा आती है। व्यापारी ने संतान प्राप्ति की कामना से सत्यनारायण व्रत किया और भगवान ने उसे संतान का वरदान दिया। लेकिन व्यापारी ने व्रत का संकल्प भूलकर उसका पालन नहीं किया, जिससे उसे कष्ट सहने पड़े। बाद में जब उसने पुनः श्रद्धा से सत्यनारायण व्रत किया, तब उसका जीवन फिर से सुखमय हो गया।
सत्यनारायण व्रत कथा आरती
व्रत कथा पूर्ण होने के बाद आरती करना आवश्यक माना जाता है। नीचे सत्यनारायण व्रत कथा आरती दी गई है:
जय लक्ष्मी रमणा श्री जय लक्ष्मी रमणा ।
सत्यनारायण स्वामी जनपातक हरणा ॥
रत्न जड़ित सिंहासन अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निराजन घंटा ध्वनि बाजे ॥
प्रगट भये कलि कारण द्विज को दर्श दियो
बूढो ब्राह्मण बनकर कंचन महल कियो ॥
दुर्बल भील कराल इन पर कृपा करी ।
चन्द्र चूड़ एक राजा तिनकी विपत्ति हरी ॥
वैश्य मनोरथ पायो श्रद्धा तज दीनी।
सो फल भोग्यो प्रभुजी फिर स्तुति कोनी ॥
भाव भक्ति के कारण छिन छिन रूप धरयो
श्रद्धा धारण कीनी तिनको काज सरयो ॥
ग्वाल बाल संग राजा वन में भक्ति करी।
मन वांछित फल दीन्हां दीनदयाल हरी ॥
चदत प्रसाद सवायो कदली फल मेवा
धूप दीप तुलसी से राजी सत्यदेवा ॥
श्री सत्यनारायण जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मन वांछित फल पावे ॥
सत्यनारायण व्रत कथा आरती सहित करने के लाभ
• घर में सुख-शांति बनी रहती है
• आर्थिक परेशानियां कम होती हैं
• पारिवारिक कलह दूर होती है
• संतान सुख की प्राप्ति होती है
• मानसिक शांति और संतोष मिलता है
निष्कर्ष
सत्यनारायण व्रत कथा आरती सहित एक पूर्ण और प्रभावशाली व्रत है। जो भी भक्त श्रद्धा, विश्वास और नियम से यह व्रत करता है, उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा बनी रहती है। यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने का एक सरल मार्ग भी है।
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