सनातन परंपरा में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनहार के रूप में पूजा जाता है। जब भी जीवन में अस्थिरता, भय या बाधाएँ आती हैं, तब विष्णु मंत्र स्तुति का पाठ मन को स्थिरता, विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति देता है।
घर में प्रातःकाल या संध्या के समय इस स्तुति का पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है। यह स्तुति केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और ईश्वर से जुड़ने का मार्ग है।
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विष्णु मंत्र स्तुति
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये।।
हम भगवान श्री विष्णु का ध्यान करते हैं जो सफ़ेद वस्त्र धारण किये गए हैं, जो सर्वव्यापी हैं, जो चंद्रमा की भांति प्रकाशवान और चमकीलें हैं, जिसके चार हाथ हैं, जिनका चेहरा सदा करुणा से भरा हुआ और तेजमय है, जो समस्त बाधाओं से रक्षा करते हैं।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, जिनके संपूर्ण अंग अतिशय सुंदर हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण, रूप, भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वजः।
मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥
भगवान विष्णु का मंगल हो, जिनके ध्वज में गरुड़ हैं उसका मंगलमय हो, जिनके कमल जैसे नेत्र हैं उसका मंगलमय हो, ऐसे प्रभु हरि का मंगलमय हो।
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै-
र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो-
यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:।।
ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण जिनके अन्त को नहीं जानते, उन परमपुरुष नारायण देव के लिए मेरा नमस्कार है।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव,
त्वमेव सर्वमम देव देवः।।
तुम ही माता हो, तुम ही पिता हो, तुम ही बन्धु हो, तुम ही सखा हो, तुम ही विद्या हो, तुम ही धन हो। हे देवताओं के देव! तुम ही मेरा सब कुछ हो।
विष्णु मंत्र स्तुति का महत्व
यह स्तुति हमें स्मरण कराती है कि जीवन का वास्तविक आधार ईश्वर है। जब मनुष्य अपने कर्म, बुद्धि और जीवन को भगवान को समर्पित करता है, तब भय, चिंता और अहंकार स्वतः दूर होने लगते हैं।
नियमित रूप से विष्णु मंत्र स्तुति का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा, मन में शांति और जीवन में संतुलन बना रहता है।
पाठ करने का सरल तरीका
• प्रातः स्नान के बाद शांत स्थान पर बैठें
• दीपक या अगरबत्ती जलाकर भगवान का ध्यान करें
• श्रद्धा से स्तुति का पाठ करें
• अंत में अपनी प्रार्थना समर्पित करें
नियमितता सबसे बड़ा साधन है।
अंतिम भाव
विष्णु मंत्र स्तुति केवल शब्दों का पाठ नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और संरक्षण का अनुभव है। जब इसे भक्ति से पढ़ा जाता है, तो यह मन को स्थिर, बुद्धि को निर्मल और जीवन को संतुलित बना देती है।
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