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शंकराचार्य कौन थे
शंकराचार्य, जिन्हें आदि शंकराचार्य भी कहा जाता है, भारतीय दर्शन के महान संत और दार्शनिक थे। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही वेद, उपनिषद और भगवद गीता का गहन अध्ययन कर लिया था। शंकराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी नामक स्थान पर हुआ माना जाता है।उनका जीवन उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, बल्कि समाज में फैले भ्रम और अज्ञान को दूर करना भी था। शंकराचार्य ने अपने विचारों और लेखन से सनातन धर्म को एक मजबूत आधार दिया।
शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत दर्शन
शंकराचार्य का सबसे बड़ा योगदान अद्वैत वेदांत का प्रचार है। अद्वैत का अर्थ है “दो नहीं”। शंकराचार्य का मानना था कि संसार माया है और वास्तविक सत्य ब्रह्म है। जब व्यक्ति सही ज्ञान प्राप्त करता है, तब वह इस माया से मुक्त होकर आत्मबोध को प्राप्त करता है।शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत दर्शन यह सिखाता है कि सत्य केवल एक ही है, और वही ब्रह्म है। उन्होंने बताया कि आत्मा और परमात्मा में कोई वास्तविक भेद नहीं है, भेद केवल अज्ञान के कारण दिखाई देता है। जब व्यक्ति सही ज्ञान प्राप्त करता है, तो उसे यह अनुभव होता है कि वह स्वयं ही ब्रह्म स्वरूप है।
शंकराचार्य के अनुसार संसार का अनुभव माया के कारण होता है। माया का अर्थ यह नहीं कि संसार अस्तित्वहीन है, बल्कि यह अस्थायी है। अद्वैत वेदांत का उद्देश्य व्यक्ति को इस अस्थायी जगत से ऊपर उठाकर शाश्वत सत्य की अनुभूति कराना है। यही दर्शन व्यक्ति को भय, मोह और दुख से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है।
चार मठों की स्थापना और शंकराचार्य
शंकराचार्य ने पूरे भारत में यात्रा कर सनातन धर्म का प्रचार किया। उन्होंने देश के चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की:
• उत्तर में बद्रीनाथ (ज्योतिर्मठ)
• दक्षिण में श्रृंगेरी मठ
• पूर्व में पुरी मठ
• पश्चिम में द्वारका मठ
इन मठों के माध्यम से शंकराचार्य ने वेदांत ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया।
शंकराचार्य द्वारा रचित ग्रंथ और स्तोत्र
शंकराचार्य ने कई महत्वपूर्ण ग्रंथ और स्तोत्रों की रचना की, जो आज भी श्रद्धा से पढ़े जाते हैं।
• विवेकचूड़ामणि
• उपदेश साहस्री
• भाष्य (गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र)
• भज गोविंदम
• सौंदर्य लहरी
इन रचनाओं में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
शंकराचार्य के जीवन से मिलने वाली सीख
शंकराचार्य का जीवन हमें सिखाता है कि उम्र नहीं, बल्कि ज्ञान और उद्देश्य महत्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने बहुत कम आयु में पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि आत्मज्ञान के बिना सच्ची शांति संभव नहीं है। शंकराचार्य का जीवन हमें यह सिखाता है कि ज्ञान और वैराग्य साथ-साथ चल सकते हैं। उन्होंने संन्यास का जीवन अपनाया, लेकिन समाज से दूर नहीं हुए। बल्कि उन्होंने पूरे देश में घूमकर लोगों को सही दिशा दिखाई और धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाया।
उनका जीवन यह भी सिखाता है कि केवल कर्म या केवल भक्ति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। शंकराचार्य ने अपने आचरण से यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि सच्चा गुरु वही है जो स्वयं को नहीं, बल्कि सत्य को केंद्र में रखे। उनकी शिक्षाएं आज के समय में भी आत्मचिंतन और आत्मविकास के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
शंकराचार्य केवल एक संत या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि सनातन धर्म के पुनरुद्धारक थे। उनके विचार, दर्शन और रचनाएं आज भी मानव जीवन को सही दिशा दिखाने का कार्य कर रही हैं। यदि हम शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत को समझने का प्रयास करें, तो जीवन की कई उलझनों का समाधान स्वयं मिल सकता है।
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